बेटे का “त्याग” बेटी का

कहते है विदा केवल होती है बेटियां
आंगन से जुदा केवल होती है बेटियां
मां का आंचल हो पिता की गोद हो
सब कुछ केवल खोती है बेटियां 

मगर उसी घर से जुदा एक बेटा भी है 
जिसका यही दर्द है बस कहता नहीं है 
ये आंगन से दूरी उसकी भी मजबूरी 
पिताजी का कंधा जिसपर बैठ खेले 
और मां के आंचल की कहानी अधूरी

उमर उसकी भी थी शुरू की जवानी 
पता है पड़ी उसको कैसे बिताने
घर उसने भी छोड़ा छोड़ा उसने गांव
छोड़ा आंगन उसने भी मां बाप बचपन 
कमी उसके त्याग में क्या फिर बताओ?

वो घर की गरीबी जो थी खानदानी 
खतम करने की बेटे पे जिम्मेदारी
 व्यस्त है उसी को मिटाने में बेटा
असमर्थ है कहानी सुनाने में बेटा

मगर ये गरीबी मिटेगी उसी की 
जब किस्मत में जिसके अमीरी लिखा हो 
वरना यह गरीबी मिटाने में यारो 
बताओ किस घर बेटा न मरा हो 
पर मरता है बेटा कहानी न मरती 
दूसरे बेटे पे जिम्मेदारी है चढ़ती
अब वो भी मरेगा गरीबी मिटाते 
मगर बेटियों की कहानी बताते 
थकेगी न दुनिया सुनाते सुनाते
मरेगा पर बेटा गरीबी मिटाते
हां मैने लिखा है नहीं ऐसा भी की
बलिदान बेटी का कम है कहीं भी
मगर सिर्फ बेटी का बलिदान गाना
और बेटे का त्याग बस कर्तव्य बताना

           – आदित्य कुमार 
                (बाल कवि)

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