जनता की ममता

है प्रश्न किया सबने केवल सरकारों से 
अब कुछ प्रश्नों के उत्तर जनता भी तो दे
क्या रिश्ता है उनका सियासी गलियारों से
सौदा ईमान का कर बैठे मक्कारों से

नेता क्या उनका फूफा,ताऊ,पापा है?
न स्वयं प्रश्न करते है न करने देते 
वो भारत पे विष बूंद छिड़कते रहते है 
और ये जाहिल चुप चाप खड़े पड़ने देते

ये हाल नहीं है केवल पहली बार यहां 
आजाद हुआ भारत तब से ही हालत है 
जो लाख कुकर्म करे नेता लेकिन फिर भी
ये करते आए उनकी सदा वकालत है

जो लोकतंत्र की परिभाषा लिंकन ने दी
ये जनता का जनता के द्वारा शासन है
उस परिभाषा की ऐसी तैसी कर डाली 
और मान लिया कि बाप मेरा सिंहासन है

गर उनसे प्रश्न करे जो सत्तर सालों का
तो बारह वर्षों का क्रंदन करने लगते
और इन बारह वर्षों वालों से पूछे तो
ये सारा दोष है नेहरू पे मढ़ने लगते 

इसी लूप में फंसा हुआ है देश मगर
इसके दोषी न ये वाले न वो वाले
दोषी तो केवल भारत की जनता ही है
जिसने इन नेताओं को बाप बना पाले

है आज स्थिति ऐसी मेरे भारत की
जो प्रश्न करे पाकिस्तानी हो जाता है
है एक पार्टी पूरा का पूरा देश बनी
उसका विरोधी भारत द्रोही कहलाता है

मजदूर प्रश्न करता है या कोई किसान 
हो पढ़ा लिखा वैज्ञानिक कोई फर्क नहीं
कुछ जाहिल है इस जनता के ही बीच बसे
न खुद करते, करने देंगे कोई तर्क नहीं

इसलिए पूछता हूं उन जाहिल लोगों से 
क्या सच में वो इस भारत की ही जनता है
गर सच में है! तो देश की ये स्थिति देख
नेताओं पे कैसे आ जाती ममता है?

             – आदित्य कुमार 
                  (बाल कवि)

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