मत कहे खुदको कवि वो
मत कहे खुदको कवि वो जो बिके दरबार में
खौफ खाकर चुप रहे जो सत्ता के हथियार से
चापलूसी हो भरा हर शब्द हर व्यवहार में
बेचकर जो खा गया हो लेखनी बाजार में
पा रहा हो पद्मभूषण मुफ्त में सरकार से
वो जो दिनकर की कलम को कर रहा शर्मशार है
या सुभद्रा की कविता को रहा जो मार है!
बाबा नागार्जुन डरे थे न जवाहर लाल से
डर गए होंगे वो भी इन चोरों और दलाल से
सोचते होंगे निराला भी ऊपर आसमान में
“जाने कैसे बन गए है ये कवि वर्तमान में”
सोचते होंगे कवि कुल के अटल भी आप में
“सूर्य को लिखने चले डर जुगनुओं के ताप से”
ऐसों को कवि मान लूं इससे मेरा इनकार है
मत कहे खुद को कवि वो जो बिके दरबार में!
– आदित्य कुमार
(बाल कवि)
Comments
Post a Comment