बूढों की भीड़
बूढों की भीड़
ताने मारने को ये समाज बन जाती और
चार लोगों की आवाज बन जाती है
काम न आई कभी मुसीबतों में लेकिन ये
ज्ञान देते वक्त वेदव्यास बन जाती है
मूक मौन रहती है लबों को सटाए जब
भरे हाट बेटियां शिकार बन जाती है
बेटी को बचा न सकी छोटी सोच वाली भीड़
बेटियों के कपड़े को छोटा बतलाती है
सरे आम गोलियों से भून दिया जाता कोई
भीड़ से न एक भी आवाज बाहर आती है
चार कौड़ियों में बेच देती है जमीर और
नेताजी को नेताजी से पिताजी बनाती है
आधी जिंदगी बिता ली पशुओं सा जीते जीते
आदमी सा जीना अब दूसरों को सिखलाती है।
– आदित्य कुमार
(बाल कवि)
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