सच में बदल गया इंसान

अपने भी अपने ना रहे,
अपनों को बना आहार,
एक एक इंच जमीन के खातिर,
सब के हाथों में हथियार,

हिन्दू मुस्लिम जाती बांटी,
बांट रहे परिवार,
मेरा है तो मेरा है,
के चलते बने खूंखार,

जो पहले के युग में,
एक मां के आंचल के नीचे रहते थे,
मेरा भाई अपना भाई,
सदा मुंह से कहते थे,

आज बने है कट्टर दुश्मन,
लेंगे एक दूजे के जान,
आज ये पता चला कि,
सच मे बदल गया इन्सान।

पिता से भी दुश्मनी निभाते,
जैसे कोई अनजान,
पिता भी सोचे मजबूरी में,
कैसी ये संतान,
सच मे बदल गया इन्सान।

बचपन में जो मेरी मा का,
नारा लगाए रहते है,
अब उनको बोझ बताते,
तू रख तू रख केवल कहते है।

जो इश्वर कभी गर्वित थे,
अपनी बनाई सृष्टि पे,
वो आज स्वयं ना देख है पाते,
अपनी दोनो दृष्टि से।

जो कोई ना कर सकता है,
हम इंसानों ने वैसा काम किया,
मा को स्वर्ग सा आदर देते,
पर हमने अपमान किया।

और जिस पिता ने पकड़ के उंगली,
हमको चलना सिखलाया था,
याद करो अपना सब कुछ देकर,
कैसे हमे पढ़ाया था,

जिसने अपना दर्द भुला कर,
सब कुछ दांव पे लगा दिया,
शर्म करो मूर्खो तुमने,
 उस बाप को घर से भगा दिया।

पशु और तुमको देखूं तो,
भला कौन महा दरिंदा है,
वो तुम ही हो मानवों,
जिससे खुद इश्वर भी शर्मिंदा है।

                                 - आदित्य कुमार

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