शेर और चूहा

एक शेर था महाघमंडी,
उसे था खुद पे खूब गुमान,
जंगल का राजा था उसको,
लगता था वो है भगवान,

चलता एकदम ठाठ बाठ से,
जंगल में सब डरते थे,
आदेश वो जो भी देता था,
सारे उसको करते थे।

एक दिन वो महाघमंडी,
पेड़ के नीचे सोया था,
खराटे लेता जोड़ जोड़ से,
सपनो में वो खोया था,

इतने में आया एक चूहा,
छोटा था पर मस्तीखोर,
चढ़ कर शेर के ऊपर चूहा,
खेल और किया बहुत शोर,

नींद खुली जब वनराजा की,
देखा कोई खेल रहा ऊपर,
देखा शेर है जाग गया तो,
चूहा कांपने लगा थर थर,

शेर ने अपने नाखून में,
चूहे को पूंछ से पकड़ लिया,
आंखे बड़ी बड़ी दिखलाई,
और चूहे को जकड़ लिया,

हाथ जोड़ चूहा फिर रोया,
बोला माफ करो हे नाथ,
आज जो मुझको बक्ष दिया तो,
एक दिन मै भी दूंगा साथ,

इतना सुनते ही वनराजा,
हसते हसते बोल पड़ा,
रे तुक्छ आकार तो देख,
मेरी मदद करेगा क्या,

इतना कहके शेर ने उस,
नन्हे चूहे को छोड़ दिया,
खूब हसाया उस चूहे ने,
मित्रता शेर से जोड़ लिया,

एक दिन आया एक शिकारी,
जंगल में जाल बिछाने को,
नजर पड़ी उस शेर पे,
उसने सोचा शेर फसाने को,

आया शेर फसा जाल में,
और भीषण दहाड़ किया,
बगल मे चूहा खेल रहा था,
उसने तभी पुकार सुना,

गया पास में पूछा मालिक,
जाल में तुम कर्ट हो क्या,
तुमतो बहुत थे शक्तिशाली,
फिर ऐसे डरते हो क्या,

बोला शेर हे नन्हे प्यारे,
पिछली बातें छोड़ो तुम,
दांत तुम्हारे बड़े है तीखे,
जल्दी जाल को तोड़ो तुम,

चूहे ने फिर जल्दी जल्दी,
जाल को दांत से कुतर दिया,
आजाद शेर जब हुआ जाल से,
चूहे को आभार किया,

इसलिए ना भूलो प्यारो,
कभी घमंड नहीं करना,
इससे सदा तुम्हे है बचना,
इससे दूर सदा रहना।

                     - आदित्य कुमार

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