मानव है यह क्यों भूल गए
धरती अम्बर और प्रकृति,
सब पे अधिकार जमाया है,
मानवता का लेके सुपारी,
निर्मम हत्या करवाया है।
मानव जैसा भेस है पर,
मानवता बेच के खाते है,
जिनसे हैवान भी शर्माए,
वोही इन्सान कहाते है।
भूखे पशुओं को ये मानव,
भोजन तो दे ना पाते है,
एक भूखा कुत्ता रोए तो,
ये भूत प्रेत बतलाते है।
जंगल के राजा को ये,
सर्कस में नाच नचाते है,
सब पे अधिकार जमा के ये,
खुद को कमजोर बताते है।
सब कुछ इनके है अधीन,
प्रकृति का बेड़ा गर्ग किया,
स्वर्ग सी बनी धरती माता को,
इनलोगों ने नर्क किया।
सब कुछ में सौदा करते है,
पशुओं को भी ना छोड़ा है,
इश्वर के इस धरती के,
सारे नियमों को तोड़ा है।
सब कुछ से इनका रिश्ता,
बस स्वार्थ के खातिर होता है,
इनको हरदम ये लगता है,
पैसों से सब कुछ होता है।
पैसों से लेके अपने स्वार्थ के,
नाव पे झूल गए,
शर्म की बात है ये मानव,
खुद की मानवता भूल गए।
- आदित्य कुमार
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