ईमान नहीं बिकने दूंगा
ईमान बेच दूं पैसों पर ये मेरे बस कि बात नहीं,
सच्चाई का बादल बन के करना है झूठ बरसात नहीं,
मै सच्चे पथ का राही हूं कह सकता दिन को रात नहीं,
बना झूठ को अपना मित्र ले सकता दिल पे घात नहीं,
झूठ से मेरी दूरी हो बस यही ख्वाब ले बैठा हूं
सच का ही एक सहारा हो बस यही ख्वाब ले बैठा हूं,
दिल मेरा झूठ को भाए न,सच मुंह से रुक कभी पाय न,
न ग़लत करू गर दुनिया से कोई मुझे झूठ बतलाए न।
हर घर में सच और सच ही हो अब ये तो देखना मुश्किल है,
सच से सब दूरी चाहते है बस चाहे झूठ ही अब दिल है,
जहां सच कि पूजा करते थे वो कहलाता था सतयुग है,
जहां ग़लत जान के भी करते वो युग कहलाता कलयुग है।
गर झूठ बोल के भी जिस दिन मिट्टी की कसम मै खाऊंगा,
सौगंध मुझे इस धरती कि उस दिन भूखा मर जाऊंगा,
भगवान नहीं कहला सकता पर सच्चा तो कहलाऊंगा,
पड़े विघ्न जीवन में बहुत पर झूठ से तो बच जाऊंगा।
- आदित्य कुमार
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