महिषासुर वध
एक बार धरा पे असुरों ने,
जब खूब आतंक फैलाया था,
नाश विनाश कर रहे धरा को,
बिन मतलब सबको सताया था,
उन सब का स्वामी महिषासुर,
वरदान ये ब्रह्मा से पाया था,
नारी को छोड़ के सृष्टि में,
कोई उसका वध ना कर पाया था,
जब सारे देव मिलके पहुंचे,
त्रिदेवों के दरबार में,
कौन नारी वध कर सकती,
महिषासुर का इस संसार में,
फिर त्रिदेवों ने अपनी शक्ति से,
जगदम्बा की उत्पति की,
महिषासुर का वध करने को,
सब ने अपनी शक्ति दी,
प्रचण्ड रूप में जगदम्बा थी,
महिषासुर से युद्ध हुआ भीषण,
नारी क्या कर सकती मेरा,
ये सोच रहा था उसका मन,
पर आगे इस भीषण रण का,
कुछ और ही था परिणाम आया,
यमराज के अगले शिकार में,
था महिषासुर का नाम आया,
उसके पापों का अंत किया,
मा दुर्गा महाकाली ने,
इस धरा को दुष्ट से मुक्त किया,
जगदम्बा शेरावाली ने,
साथ में मा ने उस दुष्ट असुर,
ये घमंड भी चुर किया,
नारी केवल अब्ला और कमज़ोर है,
ये सांसारिक भ्रम को दूर किया।
- अदित्य कुमार
"बाल कवि"
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