आजादी के पहले का भारत

मैं मतवाला कलमों वाला फिर से कलम उठाया हूं,
आजादी से पहले का भारत दर्शाने आया हूं,

इस आजादी के कामयाबी में कितनो का रक्त बहा,
आजाद हिंद करने को कितनो का था धर से शीश गिरा,

आज उन्ही शीशों की तुम्हे कहानी बतलाऊंगा मै,
कविता में आजादी का संग्राम दिखलाऊंगा मै,

नारी शक्ति की परिभाषा लक्ष्मीबाई का लहू बहा,
भारत मां के इस बेटी के जैसी दूजी मिले कहां,

हाथों की चूड़ी टूटी पर खड्ग अभी भी शोभा था,
भारत की इस वीरांगना ने नारी शक्ति खोजा था,

बैठ के घोड़े पे ये सिंहनी अंग्रेज़ों पे भारी थी,
थर थर कांपा हर एक दुश्मन दुर्गा की अवतारी थी,

अपना सब कुछ त्याग दिया पर ये वीरांगना झुकी नहीं,
तलवार लिए शत्रु थे आगे पर फिर भी ये रुकी नहीं,

पर राष्ट्र रक्षा के इस संग्राम में शीश गिराना पड़ता है,
आजाद हिंद करने के खातिर रक्त बहाना पड़ता है,

कितने ही सेनानी के रक्तों ने इस धरती को धोया था,
याद करो जब भारत ने लाखों वीरों को खोया था,

मां का इकलौता बेटा भी हसते हसते झूल गया,
आजाद हिंद को करने खातिर अपना जीवन भूल गया,

फिर भी कुछ भारत वासी कदर भूल गए बलिदानों का,
उन वीरों की कुर्बानी को भूल गए है अनजानों सा,

कहते है केवल चरखे से आजादी मिल जाती है,
केवल सत्य अहिंसा से भारत भूमि खिल जाती है,

लेकिन केवल चरखे से जंजीर हटाना मुश्किल था,
इस जंजीर को तोड़े वो शमशीर बनाना मुश्किल था,

बलिवेदी के रक्त से इस धरती का माटी धुला था,
केवल चरखे से आजादी मिलती तो क्यों फांसी पे कोई झूला था?

कविता खत्म कर रहा हूं पर एक बार गौर से सोचना तुम,
क्या केवल चरखा ही काफी था एक बार प्रश्न को खोजना तुम।।

                                              - आदित्य कुमार
                                                   "बाल कवि"


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