चोरों की महिमा (हास्य कविता)

इस पृथ्वी पे जन्मे है,
कपटी पापी चोर,
रात के अंधियारे में बैठे,
बेच है देते भोर,

इनके ऐसे करतूतों ने,
गजब कहर है ढाया,
इनलोगों ने रेल की पटरी,
डब्बे सहित चुराया।

किसी ने दो कि.मी. सड़क को,
और किसी ने पुल को,
ऐसे गायब कर डाला है,
जैसे कोई फूल हो।

धन्य है इन चोरों की महिमा,
पर जब पकड़ाते है,
वर्दी वाले साहब जी से,
डंडे भी खाते है,
जब वर्दी वाले साहब जी,
उल्टा लटकाते है,
रेल, सड़क और पुल,
सारे अपने आप निकल आते है।😂

              - आदित्य कुमार
                   (बाल कवि)

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