अच्छे दिन....
देखो भईया अच्छे दिन, सरकार दिखा रही है
हक मांगने वालों पे लाठी चला रही है
हड़ताल और धरना पर रोक लग रहे है
अच्छे दिन बताकर जनमत को ठग रहे है
सरकारी नीतियों का विरोध अब मना है
फरमान उनका जो हो तुमको वो मानना है
तानाशाह अपने चरम पे फैलता है
कुछ बोलो तो पचहत्तर का उदाहरण देता है
कहता है भूलना मत आपातकाल के दिन
माना वो था बुरा पर क्या है ये अच्छे दिन
आपातकाल का ही क्या नाम ये नया है
क्योंकि ये वक्त भी आपातकाल लग रहा है
आपातकाल में भी विरोधी को दबाया
विद्यार्थी भी उस वक्त खूब मार खाया
अच्छे दिनों में भी तो वही हो रहा है
विरोध करने वाला आज भी रो रहा है
परीक्षाओं में धांधली है चरम पे
लेकिन व्यवस्था को चुटकी भर न शरम है
दिल्ली में गुरुजनों पे लाठी बरस रहे है
विद्यार्थी यहां नौकरी को तरस रहे है
मंदिर मस्जिद बन गए, ढह गए ज्ञान के इमारत
मेरी ओर से सभी को ये अच्छे दिन मुबारक।।
– आदित्य कुमार
(बाल कवि)
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