आदरणीय रामभद्राचार्य जी के लिए एक कविता
कैसे बन गए प्रभु महंत
तुमको कैसे माने संत
मर्यादा का ज्ञान नहीं है
अहंकार है भरा अनंत
जब जब देते आए बयान
दिखाया मूर्खों वाला ज्ञान
सबको देते रहे चुनौती
साधु का ये होता काम?
बोल तुम्हारे हे गुरुवर
करते संदेह सभी इस पर
पार्टी विशेष के बने प्रवक्ता
बस तारीफ वही दिन भर
बोली में बस “मैं” की भाषा
है परमपूज्य की अभिलाषा
तुमको कैसे माने संत और
धर्म रक्षा की हो आशा
बड़बोलेपन में बाबा तुमने
किसे चुनौती दे डाला
तुम जिसे मामूली संत जाने
वो खुद है मोर मुकुटवाला
लाखों को मार्ग दिखानेवाला
असली सच्चा संत है वो
तुम जिसे चुनौती देने चले
स्वयं प्रेमानंद है वो...
– आदित्य कुमार
(बाल कवि)
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