शत्रु और अहिंसा

 अपनी रक्षा करने में गर पड़े उठाना अस्त्र शस्त्र

तो फिर क्यों जोड़े हाथ खड़े पहने अहिंसा का मिथ्य वस्त्र


अरि बन भुजंग विषदंत रोपता तुम्हें घेरकर बैठा 

चीर फाड़ दो उस भुजंग को गर्क में जाए अहिंसा


प्यासा शत्रु बैठा रण में तेरे रक्तपान को

तो फिर रख दो कोने में वहां बुद्ध-गांधी के ज्ञान को


दया अहिंसा परोपकार को भारत ने बड़ा भोगा

जब जब क्षमादान देते हैं तब तब खाया धोखा


शस्त्र त्याग कर जब अशोक ने लिया अहिंसा का प्रण

छूट गया बस वहीं से भारत का भारत पे शासन


पृथ्वीराज से जैसे ही पहला रण गोरी हारा

चूक गए चौहान तभी न उसका शीश उतारा


शत्रु ने तिलतिल कर तोड़ा युद्ध का हर कानून

मगर हमारे पूर्वजों को था क्षमा करने का जुनून


जितनी बार बिच्छू को छोड़ा खाया उतना डंक

हुआ हमें अहसास देर से सिर जब चढ़ा आतंक


लेकिन फिर न मिला वो अवसर भूल को सके सुधार

और हुआ एहसास जभी तभी दिया अरि ने मार


प्रेम अहिंसा दया भावना वहीं है शोभा देती

जहां प्रेम के बीच बुआये हो अहिंसा की खेती


अगर वक्त रहते न उतरा चोला दयाभाव का

तो फिर तुम खुद भागी होगे अपने रक्तस्राव का


इसलिए मत अवसर देन, सर्प नही विष छोड़े

मानो वरना नई किरण न देख सकोगे भोरे


             - आदित्य कुमार

                 (बाल कवि)

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