अनदेखा हार

जो जीता उसकी जीत लिखी 
शहरों में उसकी गूंज उठी 
उसको इतिहास में जगह मिला
गलियों में उसका नाम हुआ
कालीन बिछाकर स्वागत कर
फूलों की हुई बरसा उसपर 
फुलझड़ी-पटाखे फोड़े गए
मीडिया में किस्से जोड़े गए
शहरों के चौक सजाए गए
और जीते सभी बुलाए गए
कुछ सौ ही सिकंदर आए थे 
क्योंकि बस वही चुनाये थे
सबने अपना किस्सा गाया 
जीते कैसे ये बतलाया 
मेहनत को सबने श्रेय दिया
और भाषण लंबा खूब किया
माइक की थी आवाज तेज
था पूरा चौक वही इंगेज
पर उन्हीं चौक की गलियों में 
कुछ लोग उदास मिले बैठे 
उनसे उनका परिचय पूछा
खुदको किस्मत का मारा कहा
जिस जीत की जश्न मनाता शहर 
खुदको उस जंग का हारा कहा
मेहनत उनकी भी कम न थी 
दिन रात उन्होंने झोंका था
कैसे भी कर जीतेंगे हम 
उन्होंने भी ये सोचा था 
पर ये किस्मत का खेल बड़ा 
मेहनत पे पड़ता भारी है 
लाखों की भीड़ में सौ जीते
बाकी की संख्या हारी है।
हर वर्ष नया होता है जंग 
और हार जीत भी जारी है।।

         – आदित्य कुमार 
              (बाल कवि)

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