है राह ताकता सिंहासन

बाधाओं से न हारे मन 
है शेष अभी जीवन का रण 
न टूटे तेरा अंतर्मन
मंजिल करती है आवाहन 
है राह ताकता सिंहासन 

माथे पर तेरे विजय तिलक 
है जीत तुम्हारी रही झलक
तू बढ़ता जा करता गर्जन 
मंजिल करती है आवाहन
है राह ताकता सिंहासन 

उम्मीदें तुमसे लगी है जो
तुम बढ़ो उन्हें साकार करो
न व्यर्थ गवाओं एक भी क्षण 
मंजिल करती है आवाहन 
है राह ताकता सिंहासन

किस्मत का लिखा बदल दो तुम
खुदके ब्रह्मा केवल हो तुम
करदो साबित किस्मत को भ्रम 
मंजिल करती है आवाहन 
है राह ताकता सिंहासन।।

            – आदित्य कुमार 
                  (बाल कवि)

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